भाषाओं पर कुछ विचार – १

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात दिए एक वक्तव्य में उर्दू भाषा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आजकल इसे मुस्लिमों से जोड़कर से जोड़कर देखा जाता है और यही इसके घटते प्रचलन का कारण है। निश्चित तौर पर उनकी इस टिप्पणी के निहितार्थ वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य के संदर्भ में है।

परंतु जब मैंने यह रिपोर्ताज पढ़ी तो मुझे पटना में अपने कॉलेज के पहले साल की याद आ गई जब मैं १८वें चंद्रशेखर स्मृति व्याख्यान में बतौर श्रोता उपस्थित था। वह मेरा पहला सेमेस्टर था और हमारे रासेयो (राष्ट्रीय सेवा योजना) के प्रभारी प्रोफेसर ने सभी विद्यार्थियों को व्याख्यान जाकर सुनने को कहा था। व्याख्यान देने कोई मशहूर दास्तान-गो आए थे, मुझे नाम याद नहीं है। विषय था भाषा को लेकर, समाज की भाषा के लिए खोज या कुछ इसी मूल भावना को लिए हुए, यथावत याद नहीं। अपने व्याख्यान में उन वक्ता महाशय ने पहले बड़े आवेग से घोषित किया कि कैसे आज हमारा समाज भाषा की कमी से जूझ रहा है, भाषा-विहीन हो गया है और खासकर युवा नहीं जानते कि उनकी भाषा क्या है, कैसी है। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वह बोले कि आज़ादी के पश्चात क्रमिक सरकारों ने हिंदी का पक्ष लेते हुए उर्दू को दरकिनार किया। उन्होंने जो कुछ कहा उससे वहां बैठे अधिकतर श्रोताओं को बड़ा विस्मय हुआ होगा। आगे समाधान सुझाते हुए उन्होंने कहा कि उर्दू या हिंदुस्तानी ही देश की इन (कथित) भाषा समस्याओं का जवाब है। साथ ही उर्दू की गंगा-जमुनी विरासत और पंथनिरपेक्ष मानी गई छवि की भी बात की। वह २०१३ के चुनाव प्रचार का ध्रुवीकृत माहौल था और निश्चित तौर पर श्रोता-जन, जिनमें हम विद्यार्थी भी शामिल थे, की टिप्पणियाँ एवम् दृष्टिकोण प्रबल व तीखे थे। अतः व्याख्यान समाप्ति पर वक्ता को कुछ तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। एक बुजुर्ग ने, जो संभवतः कोई सम्मानित व्यक्ति थे क्योंकि उनसे सभी बहुत आदर से व्यवहार कर रहे थे, आयोजकों से बात कर के मंच पर जाकर वक्ता के तर्कों को संक्षिप्त में खारिज करते हुए कहा कि आज के युवा को उर्दू या हिंदुस्तानी अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि समय के साथ समाज ने अपनी भाषा स्वयमेव बुन ली है। इस बात को लगभग सभी उपस्थित लोगों का समर्थन मिला।

इस घटना का विवरण मैंने इसलिए दिया है कि यह उर्दू की अधोगति का शोक मनाने वाले अधिकतर लोगों के तर्क और उन्हें मिलने वाली प्रथम प्रतिक्रिया दोनों को सटीक रूप से दर्शाती है। साथ ही उक्त घटना आज के भारत में भाषा से जुड़ी कई समसामयिक चुनौतियों और अतीत के सवालों को भी छूती है।

यह देश के उत्तरी क्षेत्र में केंद्रित भाषायी मुद्दों पर आने वाली श्रृंखला की पहली परिचयात्मक कड़ी है। आने वाले कुछ ब्लॉग-पोस्टों में मैं उर्दू के विकास-काल की परिस्थितियों, हिंदी बनाम उर्दू और भाषा में पंथनिरपेक्षता जैसे कुछ मुद्दों पर अपनी टिप्पणियाँ रखूंगा।

अंग्रेजी अनुवाद यहाँ पढ़ें‍‍‍‍ | Read English translation here.

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